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इंसान की पहचान शायरी | Insan Ki Pehchan Shayari | कैसे हो पायेगी अच्छे इंसान की पहचान आजकल

आज का यह आर्टिकल अच्छा शब्द से लिया गया हैं और इस पोस्ट में आप पा सकते हैं अच्छा पर बनी ढेरो शायरियों का बेजोड़ कलेक्शन. जोकि आप सभी शायरी के कद्रदानो को यह पोस्ट बेहद ही पसंद आएगा.
अच्‍छे इंसान की सबसे पहली और सबसे आखिरी
निशानी ये है कि…
वो उन लोगों की भी इज्‍जत करता है,
जिनसे उसे किसी किस्‍म के फायदे की उम्‍मीद नहीं होती ।

Acche Insaan Ki Sabse Pahli Aur Sabse Aakhri Nishani Ye Hai Ki…
Wo Un Logon Ki Bhi Ijjat Karta Hai,
Jinse Use Kisi Kism Ke Fayde Ki Ummed Nahi Hoti..!!
इंसान” एक दुकान है, और “जुबान” उसका ताला..!!
जब ताला खुलता है, तभी मालुम पड़ता है, कि दूकान
“सोने” कि है, या “कोयले” की…!
चीज़ों से हो रही है पहचान आदमी की,
आैकात अब हमारी बाजा़र लिख रहे हैं...
कैसे हो पाएगी अच्छे इंसान की पहचान,
जब दोनों ही नकली हो गये है आँसू और मुस्कान.
गुजारिश हमारी वह मान न सके,
मजबूरी हमारी वह जान न सके,
कहते हैं मरने के बाद भी याद रखेंगे,
जीते जी जो हमें पहचान न सके.
दिल में गम, आँखों में नमी
चेहरे पर उदासी, जिन्दगी में कमी
बेबसी रूह में और होठो पे मुस्कान
जालिम, यही तो है मोहब्बत में बर्बाद
एक तरफ़ा आशिक की पहचान.
अजनबी बने रहने में सुकून है,
ये जान पहचान जान ले लेती है.
कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई ईसाई है 
सब ने इंसान न बनने की क़सम खाई है 
जान-पहचान बनाने से कुछ मिलता नही,
तूफ़ान कितना भी तेज हो पहाड़ हिलता नही.
राह चले तू भले औरों का दामन थाम ले,
मगर मेरे प्यार को भी तू जरा पहचान ले,
कितना इन्तजार किया है तेरे इश्क में मैंने,
जरा इस दिल की बेताबी को भी तू जान ले.
बड़ी अजीब सी है शहरों की रौशनी,
उजालों के बावजूद चेहरे पहचानना मुश्किल है.
दोस्ती का शुक्रिया कुछ इस तरह अदा करू,
आप भूल भी जाओ तो मे हर पल याद करू,
खुदा ने बस इतना सिखाया हे मुझे
कि खुद से पहले आपके लिए दुआ करू..
तेरा नजरिया मेरे नजरिये से अलग था…
शायद तूने वक्त गुजारना था और हमे सारी जिन्दगी..
वाह रे इश्क़ तेरी मासूमियत का जवाव नहीं.।।
हँसा हँसा कर करता है बर्बाद तू मासूम लोगो को.।।
मेरी पहचान !! …… MERI PEHCHAAN !!


ज़िन्दगी को , अपनी तरह , जीने का गुमान है ,
शायद यही , और सिर्फ यही , मेरी पहचान है !

यूँ तो जी , सकता हूँ मैं भी , लोगों की तरह ,
पर उन्हें , मर मर के जीते , देख मन हैरान है !

वो कहते हैं , ये मैं नहीं , बस मेरा सुरूर है ,
पर मैं जानता हूँ , खुदा मुझ पे , मेहरबान है !

कैसे कह दूं कि मुझे , जिस्म की , परवाह नहीं कभी ,
जब मैं जानता हूँ , दिल मेरा इसका , मेहमान है !

क्यूँ गुज़रे वक़्त को , आगे से , जोड़ते हैं हम ,
सदियों का यहाँ बिखरा , हर पल में , सामान है !

पल की अगले ना ख़बर , पर दूर , सोचते हैं हम ,
ख़ुद पे इतना , क्यूँ हमें , इत्मीनान है !

क्यूँ गुरूर , होता है उन्हें , ऊँचे मुकाम पर ,
पतंग की उंचाई , तो हवा की , मेहरबान है !

फ़र्क दिल और जान का , जो , कर सके यहाँ ,
वो ही बस , पत्थर नहीं , एक इंसान है !

ज़िन्दगी को , अपनी तरह ,जीने का गुमान है ,
शायद यही , और सिर्फ यही , मेरी पहचान है !
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